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HART: Dussehra 2019: Vijayadashami Celebration by Indians in Bamako, Mali

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Dussehra 2019: Vijayadashami Celebration by Indians in Bamako, Mali

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HART: History of Purnia (पूर्णिया का इतिहास)

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पूर्णिया का इतिहास

वर्तमान पूर्णिया बिहार के उत्तर – पूर्वी भाग में बसा एक जिला है जिस की स्थापना 14 फरवरी 1770 को East India Company द्वारा किया गया था। आज के समय में इसे कोसी-सीमांचल के नाम से भी जाना जाता है। 1771 में कई यूरोपीय लोग रामबाग में बस गए। रामबाग में British सेना की छवानी भी थी। रामबाग और आस पास के इलाके में कुछ घर, चर्च और कब्रिस्तान आज भी मौजूद हैं जो British कालीन हैं।

आज 14 फरवरी 2019 को पूर्णिया जिला 250वें वर्ष में प्रवेश कर गया है। पहले के बनिस्पत आज पुर्णिया ने काफी तरक्की कर ली है। छोटे और मँझोले mall/supermarkets, होटलों, और अच्छे-अच्छे स्कूलों की वजह से भी पूर्णिया को आज पूरे भारत में एक अच्छा मुकाम हासिल है।

सरकारी Engineering और Medical college, Polytechnic, Agriculture College के अलावे और भी अच्छे private शिक्षण संस्थान यहाँ मौजूद हैं। वर्तमान पूर्णिया में Purnia University भी 18 मार्च 2018 से अस्तित्व में आ गया है जिनके अंतर्गत आने वाले colleges अच्छी और उच्च कोटि की शिक्षा दे रहे हैं। सोने पे सुहागा वाली बात ये है कि पूर्णिया एक Medical hub के रूप में विकसित हो रहा है। अच्छी और चौड़ी सड़कें, सड़कों पर रौशनी इसमें चार चाँद लागते हैं। लोगों के रहन सहन में भी विगत कुछ वर्षों से काफी बदलाव देखा जा सकता है।

पूर्व में पूर्णिया का भोगोलिक क्षेत्र बहुत विशाल था। वर्तमान भागलपुर के साथ – साथ मालदा और दार्जिलिंग जिला का भी कुछ हिस्सा पूर्णिया क्षेत्र में आता था जो बाद में British सरकार द्वारा सीमांकन कर अलग कर दिया गया था। फिर भारत की आजादी के बाद कटिहार को 1976 में, तथा अररिया और किशनगंज को 1990 में पूर्णिया से अलग कर 3 नए जिले बना दिये गए।

वर्तमान में इसके उत्तर में अररिया और किशनगंज जिला, दक्षिण में भागलपुर और कटिहार जिला, पूर्व में पश्चिम बंगाल का दिनाजपुर जिला तथा पश्चिम में मधेपुरा जिला है। यहाँ हिन्दू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध और क्रिश्चियन सभी धर्मों को मनाने वाले लोग रहते हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पूर्णिया में 14 अगस्त 1947 की आधी रात को अर्थात, 15 अगस्त की रात 12 बजकर 1 मिनट पर तिरंगा झण्डा फहराया गया था, और यह परंपरा 71 वर्षों से लगातार जारी है। पूर्णिया शहर के भट्ठा बाजार स्थित झण्डा चौक पर रष्ट्र्गान और भारत माता की जय के नारे के साथ झण्डा फहराया जाता है। ऐसा भारत में सिर्फ दो ही जगह होता है। पहला पूर्णिया और दूसरा बाघा बोर्डर है।

ऐसा भी कहा जाता है कि पूर्णिया क्षेत्र प्राचीन काल में नेपाल का हिस्सा हुआ करता था और ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा इसे कुछ terms & conditions के तहत भारत मेँ मिलाया गया था क्यूंकि यहाँ कि जलवायु और मौसम अंग्रेजों को रहने के अनुकूल लगा था। हालांकि इतिहास में इसका कोई विस्तृत वर्णन नहीं मिला है। वैसे महाभारत काल के साक्ष्यों से ये बात सिद्ध भी होती है कि पूर्णिया नेपाल का ही भाग था।

इतिहास में पूर्णिया जिला के नाम की उत्पत्ति के कई मत मिले हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार पूर्णिया प्रांत का नाम इसके भौगोलिक और धार्मिक स्थिति को देख कर रखा गया है। प्राचीन में यह प्रांत पूर्ण रूप से जंगलों से भरा होता था जिसे तीन नदियों गंगा, कोसी और महानंदा ने चारों तरफ से घेर रखा था। और ये पूरी तरह से जंगलों से भरा था। संस्कृत में पूरा को पूर्ण और जंगल को “अरण्य” कहते हैं। अर्थात, पूरा जंगल का संस्कृत शब्द “पूर्ण – अरण्य” होता है। पूर्ण-अरण्य की वजह से यह “पुरनियाँ” के नाम से जाना जाता था। बाद में पुरनियाँ का अपभ्रंश “पूर्णिया” नाम इस्तेमाल होने लग गया। माता पूरन देवी का मंदिर भी अति-प्राचीन है जो पुर्णिया शहर से लगभग 5 किमी की दूरी पर है। यह मंदिर लगभग 600 वर्ष पुराना बताया जाता है।

हालांकि कुछ इतिहासकार ये भी कहते हैं कि इसके नाम की उत्पत्ति “Purain” अर्थात “कमल (Lotus)” से हुई है; क्यूंकी कमल कोसी और महानंदा की नदियों में उगाया जाता था। और इसका नाम “पुरनिया” था जो कि बाद में “पूर्णियाँ” हो गया।

यह वही पूर्णिया जिला है जिसे कभी काला-पानी के नाम से भी जाना जाता था। इसका मुख्य कारण था तीनों नदियों द्वारा लाया गया गाद और हिमालय के जंगलों के बीच से निकालने वाला काला पानी जो यहाँ के जंगलों में आकार बस जाता था।

क्या आप जानते हैं कि भारत में एक पाकिस्तान भी है? शायद नहीं जानते होंगे। तो आपको ये बता दें कि पूर्णिया जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी की दूरी पर एक गाँव है जिसका नाम पाकिस्तान है।

पूर्णिया का ऐतिहासिक महत्व (Historical importance of Purnia)

पूर्णिया जिला का स्थान प्राचीन से ही गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक रहा है। इस जिले का गौरवपूर्ण संबंध महाभारत काल से रहा है। ऐसा माना जाता है कि पूर्णिया जिले के रामबाग क्षेत्र में पाँडवों ने अपने वनवास के आखिरी दिन बिताए थे। जहां से वे अज्ञातवास के लिए राजा विराट के यहाँ विराटनगर चले गए थे।

ऐसा भी माना जाता है कि अंग प्रदेश के राजा कर्ण जिन्हें अंगराज कहते थे, जब पहाड़ी जन-जातियों को युद्ध में हराते हुए आगे बढ़ रहे थे तो उनका सामना भीम से हो गया। वर्तमान मुंगेर और भागलपुर जिला अंग प्रदेश ही था जिसकी वजह से वहाँ की भाषा अंगिका है। भीम पांचों भाइयों के साथ उस वक़्त वनवास का वक़्त गुजार रहे थे। फिर दोनों के बीच कई दिनों तक युद्ध चलता रहा। कर्ण हालांकि गदा युद्ध में निपुण नहीं थे फिर भी भीम के साथ कर्ण ने गदा युद्ध किया। जिसमें भीम विजयी हुआ और कर्ण को हार का सामना करना पड़ा। कर्ण वही से वापस अंग प्रदेश चला गया। कर्ण ने ये जानकारी हस्तीनपुर में दुर्योधन को भिजवाई, तत्पश्चात दुर्यौधन की सेना पांडव से यौद्ध करने यहाँ आया लेकिन तब तक सभी पांडव विराटनगर जा चुके थे।

महाभारत काल के एक और प्रमाण में ठाकुरगंज में रखा हुआ एक बड़ा सा कड़ाहा है जिसके बारे में कहा जाता है कि इस कड़ाहे में पांडव खाना बनाते थे। यहीं पर भीम ने कीचक बध भी किया था और यहाँ पर एक तकियानुमा गोल टीला है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह भीम तकिया है। अगले विडियो में इसके बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे।

पूर्णिया जिला के बनमनखी प्रखण्ड में सिकलीगढ़ धरहरा गाँव है। ऐसा माना जाता है कि भगवान नरसिंह अपने भक्त प्रह्लाद कि जान की रक्षा उसके पिता हिरण्यकश्यप से करने के लिए यहीं पर एक खंभे को फाड़कर अवतरित हुये थे। यह खंभा आज भी मौजूद है जिसकी मोटाई लगभग 12 फीट है। भगवान नरसिंह ने यहीं पर हिरण्यकश्यप को मारा था।

ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी कि कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया कि उसे ना कोई “घर में मार सके, ना बाहर, ना अस्त्र से, ना शस्त्र से, ना दिन में, ना रात में, ना मनुष्य, ना पशु, ना आकाश में और ना पृथ्वी पर” मार सके। इसलिए भगवान विष्णु नरसिंह के रूप में अवतरित होकर उसे अपनी जंघा पर रखकर अपने नाखूनों से चीर डाला था।

यही वो गाँव भी है जहां प्रहलाद की बुआ होलिका उसे गोद में लेकर आग में बैठ गयी थी प्रहलाद को जलाने के लिए। क्योंकि होलिका को वरदान में भगवान द्वारा एक चादर की प्राप्ति हुई थी जिसे ओढ़ने पर वो आग में नहीं जलती। परंतु कुछ ऐसा हुआ की एक हवा के झोंके में उसका चादर उड़ गया और वो जल गयी तथा प्रहलाद बच गया।

मान्यता के अनुसार प्रहलाद के जीवित बचने की खुशी में होली का त्योहार मनाया जाता है तथा होलिका दहन किया जाता है।

पूर्णिया की इस धरती पर कई विभूतियों ने भी जन्म लिया जिनमे:

फणीश्वर नाथ रेणु (Novelist)

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को औराही हिंगना, फारबिसगंज में हुआ था। फारबिसगंज पहले पूर्णिया जिला के अंतर्गत ही आता था। ये हिन्दी भाषा के साहित्यकार थे। इनके द्वारा लिखे गए पहले उपन्यास “मैला आँचल” को बहुत प्रसिद्धि मिली और इसके लिए उन्हें ‘पद्मस्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। रेणु के लिखे एक कहानी “Mare Gaye Gulfam” के ऊपर हिन्दी सिनेमा के show man Raj Kapoor ने एक फिल्म भी बनाई थी जिसका नाम था – Teesri Kasam. इस फिल्म कि shooting भी Purnia में ही कि गयी थी। इसमें मुख्य कलाकार थे खुद राज कपूर और वहीदा रहमान। फिल्म super-duper हिट साबित हुई थी। इसके आलवे भी इन्होने बहुत सारी उपन्यास और कहानियाँ लिखी।

सतिनाथ भादुरी (Novelist and Politician)

सतिनाथ भादुरी का जन्म 27 September 1906 में पूर्णिया में हुआ था। ये एक बंगाली लेखक थे। इनके पहला novel ‘Jagari’ 1946 में लिखा था जिसके लिए 1950 में उन्हें पहला “रबीन्द्र पुरस्कार” मिला।

बलाई चंद मुखोपाध्याय (Playwright and Poet)

बलाई चंद मुखोपाध्याय का जन्म 19 जुलाई 1889 को Manihari (अब Katihar जिला) में हुआ था। ये एक बंगाली उपन्यासकार, छोटे कहानी, नाटककार, कवि और चिकित्सक थे। इन्हें “पद्म भूषण” से सम्मानित किया गया था।

भोला पासवान शास्त्री (3 times Chief Minister of Bihar)

भोला पासवान शास्त्री का जन्म 1914 ईस्वी में बेरगचछी, पुरनिया जिला में हुआ था। ये एक freedom fighter थे और 3 बार बिहार के मुख्यमंत्री के पद को उन्होने शुशोभित किया। भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया है, यह पुर्णिया में है।

HART: Invaluable Bihar (अमूल्य बिहार)

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बिहार का इतिहास

प्राचीन में बिहार (Click Invaluable Bihar) एक समृद्ध और सुसंस्कृत प्रदेश था। हालांकि हमें ये कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि बिहार में संस्कृति आज भी जिंदा है जिसके बल पर ही यहाँ के लोग हर क्षेत्र मे हमेशा अव्वल रहते हैं और स्वाभिमानी हैं।

बिहार भारत के पूर्व भाग में बसा एक राज्य है। बिहार की राजधानी पटना है जो कि पहले पटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था । बिहार के उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखण्ड स्थित है।

बिहार नाम की उत्पत्ति बौद्ध सन्यासियों के भ्रमण से जुड़ा है। बिहार का पौराणिक नाम ‘विहार’ है। विहार का शाब्दिक अर्थ होता है – मठ । यहाँ बोध गया में बौद्ध मठ होने के कारण बहुतायत संख्या में बौद्ध सन्यासी विहार करने आते थे। इसलिए इसका नाम विहार पड़ा। जो कि कालांतर में इसका अपभ्रंश रूप बिहार से संबोधित किया जाने लगा। यह क्षेत्र गंगा तथा उसकी सहायक नदियों के उपजाऊ मैदानों में बसा है।

ये सत्य है कि बिहार के लोग बहुत ही मेहनती और बुद्धिमान होते हैं। साथ ही साथ स्वाभिमानी भी होते हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से बिहार की शिक्षा व्यवस्था का स्तर गिर गया है फिर भी देश के सब से कठिन प्रतियोगिता जैसे आई आई टी (IIT) और यूपीएससी (UPSC) में बिहार के छात्र हमेशा अव्वल रहते हैं।

आधिकारिक भाषा (Official Language)

हिन्दी और अंग्रेजी

बोली जाने वाली भाषा (Spoken Language)

हिन्दी, अंगिका, भोजपुरी, मगही, उर्दू, मैथिली

प्रमुख पर्व (Major Festivals)

छठ, दीपावली, दशहरा, होली, महाशिवरात्री, नागपंचमी, ईद, मुहर्रम, क्रिसमस, प्रकाश पर्व इत्यादि

प्रमुख व्यंजन (Major Dishes)

खाजा, मोतीचूर के लड्डू, बालूशाही, तिलकुट, सत्तू, चूड़ा-दही, लिट्टी-चोखा, लहसुन की चटनी इत्यादि

तो आइये हम आपको बिहार के बारे में कुछ खास बातें बताते हैं जो शायद आप नहीं जानते होंगे और इसे जानने के बाद आप गर्व से कह सकते हैं कि हम बिहार के रहने वाले हैं।

रामायण काल

बिहार का उल्लेख रामायण में भी मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र का आश्रम बक्सर (बिहार) में स्थित था जिसे ‘सिद्धाश्रम’ के नाम से जाना जाता था जहां विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को ताड़का और सुबाहु आदि राक्षसों को मारने के लिए लेकर आए थे। बिहार के कई स्थान जैसे, मगध, मिथिला, अंग आदि प्राचीन और धार्मिक ग्रन्थों में भी वर्णित है। मिथिला वो जगह है जहां श्री राम कि अर्धांगिनी माता सीता का जन्म हुआ था। मिथिला के राजा जनक जी थे और उन्हीं की पुत्री सीता थी, जिसका कि वर्णन रामायण में मिलता है।

महाभारत काल

बिहार का उल्लेख महाभारत जैसे ग्रन्थ में भी मिलता है। महाभारत काल में कई ऐसी घटनाएँ बिहार के पूर्णिया, मगध और राजगीर में हुई हैं। ऐसा माना जाता है कि रावण के ससुर और परम मित्र जरासंध का वध राजगृह में हुआ था। आज के समय में राजगृह को राजगीर के नाम से जाना जाता है। मगध नरेश शकुनि का भी वर्णन महाभारत में है। आज का पटना और गया division उस वक़्त मगध में था। आज बिहार में मगध एक स्वतंत्र division है।

नालंदा विश्वविद्यालय

बिहार शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में सबसे अव्वल था। यहाँ का नालंदा विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध था। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त (450-470) द्वारा किया गया था। यह बौद्ध धर्म के शिक्षा का केंद्र था परंतु साथ ही कई धर्मों के लोग कई देशों से यहाँ आकार पढ़ते थे। कई अभिलेखों और भारत भ्रमण पर आए चीनी यात्री हवेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरण में भी इसकी विस्तृत जानकारी मिलती है। 7वी शताब्दी में हवेनसांग ने एक विद्यार्थी और शिक्षक के रूप में पूरा 1 साल यहाँ बिताया था। इस विश्वविद्यालय में लगभग 10,000 विद्यार्थी पढ़ते थे और लगभग 2,000 शिक्षक थे। इसके कुलपति थे – आर्यभट्ट, जो कि महान गणितज्ञ और खगोलीय वैज्ञानिक थे।

हालांकि कालान्तर में यह विश्वविद्यालय उपयोग में लाना बंद हो गया था जिसके कारण इसकी अवस्था जीर्ण – शीर्ण हो गयी थी। परन्तु वर्तमान सरकार की पहल के कारण इसे फिर से शुरू किया गया है।

चक्रवर्ती सम्राट अशोक

सम्राट अशोक का जन्म मौर्य राजवंश में हुआ था, जो कि दुनिया के इतिहास में ईसा पूर्व 269 से 232 में सबसे बड़ा शासक माना जाता था। चक्रवर्ती का मतलब होता है – ‘सम्राटों के सम्राट’ और यह स्थान भारत में सिर्फ सम्राट अशोक को ही मिला था। सम्राट अशोक का साम्राज्य आज के सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान तथा म्यांमार के अधिकांश भू-भाग पर था।

261 ईसा पूर्व में कलिंग युद्ध के दौरान लगभग 1 लाख लोगों की हत्या को देख कर सम्राट अशोक का दिल द्रवित हो गया। तत्पश्चात अपना राज्य अपने उत्तराधिकारी को सौंप कर उन्होने बौद्ध धर्म अपना लिया और शांति, सामाजिक प्रगति और धार्मिक प्रचार में बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि कहते हुये लग गए। भारत के राष्ट्रीय चिन्ह – जिसमे 4 शेर होते हैं जिसका की 3 शेर सामने दिखाई देता है और एक शेर पीछे की तरफ होता है – अशोक लाट और तिरंगा में बने चक्र अशोक के सिंह स्तंभ से लिए गए हैं। सड़कों के किनारे पेड़ लगवाने का काम सम्राट अशोक ने ही शुरू किया था जो आज भी जारी है।

आचार्य चाणक्य

आचार्य चाणक्य को कौन नहीं जानता है। चाणक्य नीति आज भी पूरी दुनियाँ में प्रसिद्ध है। चाणक्य को कौटिल्य, कौटल्य, विष्णुगुप्त, वात्स्यायन, मलंग, कत्यान इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। इनके नाम, जन्म स्थान तथा जन्म तिथि के बारे में कोई सटीक जानकारी इतिहासों में भी उपलब्ध नहीं है। इतनी जानकारी अवश्य है कि चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय में प्राचार्य थे, वर्तमान में तक्षशिला पाकिस्तान के इस्लामाबाद और रावलपिंडी से 32 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। आचार्य चाणक्य का कर्म क्षेत्र पटलिपुत्र (वर्तमान में पटना) था जहां वे मौर्य साम्राज्य के महामंत्री थे। इनके द्वारा रचित अर्थशास्त्र, राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि महान ग्रंथ हैं।

आर्यभट्ट

आर्यभट्ट के जन्म तिथि और स्थान के बारे में इतिहासकारों में भिन्नता है। परन्तु आर्यभट्ट ने जो आर्यभटीय ग्रंथ कि रचना की उसके अनुसार उनका जन्म शक संवत 398 में कुसुमपुर में हुआ। कुसुमपुर जो कि वर्तमान पटना का प्राचीन नाम है। ये प्राचीन भारत के महान ज्योतिशविद और गणितज्ञ थे। कोपरनिकस (1473-1543 ई.) ने जो खोज सभी उन्नत साधनों के जरिये किया था, उसकी खोज आर्यभट्ट ने लगभग हजार वर्ष पूर्व कर दिया था। उन्होने अपनी महान कृति आर्यभटीय में ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्त और उससे संबन्धित गणित को 120 छंदों के रूप में लिखा जिसमे मुख्य रूप से पाई का मान है:

(Pi, पाई) का मान – 100 में 4 जोड़ें, 8 से गुणा करें फिर 62,000 जोड़ें और 20,000 से भाग दें।
अर्थात, {(100+4) x 8+62,000}/20,000 = 3.1416
इनके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात 3.1416 है।

इसके आलवे अनिश्चित समीकरण, बीजगणित, खगोल विज्ञान, सौर प्रणाली कि गतियाँ, ग्रहण, नक्षत्रों के आवर्तकाल, सूर्य केन्द्रीयता इत्यादि पर भी आर्यभट्टम में छंद के रूप में विस्तार से लिखा है। शून्य (Zero) की खोज भी आर्यभट्ट ने ही की थी।

दोस्तो, बिहार का इतिहास इतना गौरवपूर्ण है कि सारी बातें जानने के बाद आप गर्व से कहेंगे कि हाँ हम बिहार के रहने वाले हैं। क्यूंकि जो बात बिहार में है वो कहीं नहीं है।

A sketch (Hand Art) from village

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This sketch has been sent to us by Rishav Ojha; these are created by him. He is about 14 year’s old son of his parents Mrs. & Mr. Ratan Ojha. He has born in 2003 in Manihari village in district Katihar, Bihar. According to their parents, Rishav was interested in pencil and brush since childhood; so they also encouraged him very much. The result of this is that when a 14-year-old child makes a drawing, then people are forced to think that this is a work done by a child or some mature hands have pulled this line picture. Whether it is on the page of papers or on a leaf; and, or mehndi art on the hand and feet of any girls or women; Rishav made similar to the one performed artist. Now look at yourself and decide… Click here to watch Video. यह रेखा चित्र हमें श्री ऋषभ ओझा जी ने भेजा है। यह उनके खुद के द्वारा बनायीं गयी स्केच (रेखा चित्र) हैं। ऋषभ ओझा की उम्र तकरीबन १४ वर्ष है। वह अपने माता-पिता श्री और श्रीमती रतन ओझा के पुत्र हैं और 2003 में जिला कटिहार, बिहार के मनिहिरी गांव में पैदा हुए थे। इनके माता – पिता के अनुसार ऋषभ बचपन से ही पेंसिल और ब्रश में रूचि रखते थे और उन्होंने उनको काफी प्रोत्साहित भी किया। इसी का नतीजा है कि ये  १४ वर्ष का बच्चा जब कोई ड्राइंग बनाता है, तो लोगों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि ये कारनामा किसी बच्चे ने कर दिखाया है या किसी परिपक्व हाथों ने इस रेखा चित्र को खींचा है। फिर चाहे कागज़ के पन्नों पर हो, या फिर किसी पत्तों पर और या फिर किसी बालाओं के हाथों और पैरों पर मेंहदी लगाने की बात हो; ऋषभ बिलकुल एक मंजे हुए कलाकार की तरह ही रेखा चित्र बनाते हैं। अब आप खुद ही देख कर फैसला कीजिये …

 
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